Friday, August 19, 2011

क्या मिला तुम्हें?




क्या मिला किसी का घर जलाके
क्या मिला किसी मासूम को रुलाके
एक बार अपने घर में झाँक के देखो
क्या खोया है तुमने, वो सब कुछ पा के


वो मासूम सी हंसी कहीं दबी हुई है
तुम्हारी रूह भी तुमसे दरी हुई है
धड़क रहा है ज़ोरों से दिल मगर
सासें तो फिर भी रुकी हुई हैं



चैन को तुम्हारे भी अब चैन नहीं
रातें हैं काली, पर नींद नहीं
किस सुबह की राह देखतो हो अब
इस राह में अब कोई लौ नहीं

चलना अकेले ही होगा अब तुम्हें
यह सदायें ही बनेंगी परछाई
न होगा कोई हमदम इस सफ़र में तुम्हारा
किस्मत में खुद ही लिख ली तुमने तन्हाई

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